किनारे

हम मिलेंगे दूर उस नदी  के किनारे,
जो बरसों पहले सूख गई थी,
जीवन दिया था, जिसे तुम्हारे हाथों ने,
अपने फावड़े से। 

बरसों पहले वहां कोई आता भी नहीं था,
बिना पानी के कौन पूछता है, 
नदियों को,
इक बरसात के अलावा ।

बस तुमने रचा था,
अपने अंदर के जज्बे से,
 सूखी पड़ी नदी को,
वापिस बदला था 
लहरों में ।

अब जबकि नदी की पुरानी जवानी लौट आई है,
और लौट आए हैं, सभी परदेश गए लोग,
केवल तुम ही छोड़ गई,
अपने चंदर को बेवजह, बिना सहारे।



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